




संस्थान के निदेशक डॉ. आर.के. यादव ने बताया कि दक्षिण भारत में चंदन की खेती पारंपरिक रूप से की जाती रही है। 2001 में चंदन की खेती पर प्रतिबंध हटने के बाद देशभर के किसानों में चंदन उगाने की रुचि बढ़ी। हालांकि, तकनीकी जानकारी की कमी के चलते यह खेती अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं पा सकी थी। इसी चुनौती को देखते हुए संस्थान ने पिछले तीन वर्षों में चंदन की खेती के लिए शोध कार्य किए। इसके तहत चंदन के विभिन्न क्षेत्रों से क्लोन्स एकत्र किए गए और उन्हें उतरी भारत के जलवायु के अनुकूल बनाने पर काम किया गया।
संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक (कृषि वानिकी) डॉ. राज कुमार ने चंदन की खेती को “मुनाफे की खेती” करार दिया। उन्होंने बताया कि चंदन का पेड़ जितना पुराना होगा, उसकी कीमत उतनी ही अधिक होगी। 15 साल में एक चंदन के पेड़ की कीमत 70 हजार से दो लाख रुपये तक हो सकती है। यदि कोई किसान 50 पेड़ लगाता है, तो 15 साल बाद वह करोड़पति बन सकता है।
डॉ. राज कुमार ने इसे किसानों के लिए भविष्य की सुरक्षित पूंजी बताया। उन्होंने कहा कि यदि परिवार में बेटी या बेटे के जन्म पर 20 चंदन के पौधे लगाए जाएं, तो उनकी शादी के समय बड़ी आर्थिक मदद मिल सकती है।
बता दें कि, चंदन एक परजीवी पौधा है, यानी इसे अपनी खुराक के लिए अन्य पौधों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसकी जड़ें पास के पौधे की जड़ों से जुड़कर पोषण प्राप्त करती हैं। चंदन की खेती में इसकी विशेष जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है। चंदन के साथ किसी अन्य पौधे को लगाना अनिवार्य है।
संस्थान में चंदन की खेती पर शोध और प्रशिक्षण परियोजना चलाई जा रही है। इसमें किसानों को बताया जाएगा कि चंदन के पौधों के बीच कितनी दूरी होनी चाहिए, उन्हें कितना खाद-पानी देना है, और किन फसलों को साथ में लगाया जा सकता है। खासतौर पर कम पानी वाली दलहनी फसलों पर जोर दिया जा रहा है।
डॉ. राज कुमार ने किसानों को सुझाव दिया कि चंदन की खेती के साथ फलदार पौधे भी लगाए जा सकते हैं। इससे चंदन के 15 सालों तक बड़े होने की अवधि के दौरान भी किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिल सकेगी।




