




जाकिर हुसैन का जन्म 1951 में हुआ था। उनकी अद्भुत प्रतिभा ने उन्हें भारत के ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संगीत मंचों का जाना-माना चेहरा बना दिया। उन्होंने न केवल शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल की, बल्कि फ्यूजन संगीत में भी अपनी छाप छोड़ी। जाकिर हुसैन को 1988 में पद्म श्री, 2002 में पद्म भूषण, और 2023 में पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया।
2024 के 66वें एनुअल ग्रैमी अवार्ड्स में उन्होंने तीन पुरस्कार जीतकर भारत के पहले संगीतकार के रूप में इतिहास रच दिया। उन्हें बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक एल्बम, बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक परफॉर्मेंस, और बेस्ट कंटेम्पररी इंस्ट्रूमेंटल एल्बम के लिए सम्मानित किया गया। ये उपलब्धियां उनकी संगीत यात्रा का सुनहरा अध्याय हैं।
जाकिर हुसैन अपने पीछे पत्नी एंटोनिया मिनेकोला, बेटियां अनीसा कुरैशी और इसाबेला कुरैशी, और भाई-बहनों का बड़ा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी बेटी अनीसा अपने पति टेलर फिलिप्स और बेटी जारा के साथ रहती हैं।
जाकिर हुसैन ने मशहूर बैंड ‘शक्ति’ की शुरुआत की, जिसमें उनके साथ टी.एच. विक्कू विनायकराम और अन्य संगीतकार शामिल थे। यह बैंड भारतीय शास्त्रीय संगीत और पश्चिमी फ्यूजन का अद्भुत उदाहरण था। हालांकि, 1977 के बाद यह बैंड ज्यादा सक्रिय नहीं रहा, लेकिन इसकी धुनें आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हुई हैं।
जाकिर हुसैन की विरासत केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं है। उनके द्वारा स्थापित किया गया संगीत का मानक आने वाले समय में भी तबला वादन और भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए प्रेरणा बना रहेगा। उन्होंने अपने छह दशक लंबे करियर में कई दिग्गज भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ काम किया और भारतीय संगीत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई।
जाकिर हुसैन के जाने से संगीत जगत में एक गहरा शून्य आ गया है। उनकी तबले की थाप, उनकी जादुई उंगलियों का स्पर्श, और उनकी अनूठी शैली को शब्दों में बांध पाना मुश्किल है। वह केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि संगीत के जीवंत स्वरूप थे। उनका जाना संगीत प्रेमियों के लिए एक युग के अंत के समान है।
जाकिर हुसैन ने अपने सुरों से जो दुनिया बसाई थी, वह हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगी। उनका जीवन एक प्रेरणा है, जो हमें अपने जुनून को पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ जीने की सीख देता है।




