




Inkhabar Haryana, Kartikeya Sharma: भारतीय संसद को अक्सर लोकतंत्र के मंदिर के रूप में संबोधित किया जाता है। यह संस्था न केवल कानून निर्माण का एक मंच है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता, बहुलवाद और लोकतांत्रिक परंपराओं का भी प्रतीक है। राज्यसभा सांसद कार्तिकेय शर्मा ने इस पवित्र संस्थान की गरिमा बनाए रखने और इसके कार्यों को राजनीतिक या व्यक्तिगत स्वार्थों से मुक्त रखने पर जोर दिया है। उनका मानना है कि संसद के कद को केवल उचित, संयमित और जिम्मेदार आचरण के माध्यम से ही सम्मानित किया जा सकता है।
आजादी के शुरुआती दशक में भारतीय संसद ने अनुकरणीय कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन किया। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी संसद की पवित्रता पर बल देते हुए इसे “भारत की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और विशेषाधिकार” बताया था। लेकिन समय के साथ संसद के कामकाज में व्यवधान और राजनीतिक नाटक बढ़ने लगे।
1952-62 की पहली दो लोकसभाओं में व्यवधान की घटनाएं लगभग न के बराबर थीं, लेकिन तीसरी लोकसभा के दौरान राजनीतिक असहमति ने व्यवधानों की शुरुआत कर दी। पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान सांसदों द्वारा वॉकआउट और व्यवधान देखा गया। इसके बाद यह प्रवृत्ति बढ़ती गई, जिससे संसद की कार्यक्षमता और उसकी प्रतिष्ठा पर सवाल उठने लगे।
राज्यसभा को “उच्च सदन” के रूप में हमेशा एक विशिष्ट स्थान दिया गया है। इसे ऐसा मंच माना गया है जहां सरकार के विधायी एजेंडे की निष्पक्ष समीक्षा हो सके और बहुमत के अत्याचार से बचा जा सके। लेकिन हाल के वर्षों में व्यवधान की प्रवृत्ति राज्यसभा में भी गहराई से देखी गई है। सांसद कार्तिकेय शर्मा ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि व्यवधानों के कारण वह एक साल तक अपना पहला भाषण नहीं दे सके।
संवैधानिक कर्तव्यों की उपेक्षा केवल सदन के सदस्यों की गरिमा को कम नहीं करती, बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत की छवि को कमजोर करती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संसदीय प्रक्रियाओं का दुरुपयोग बढ़ रहा है, जिससे न केवल जनता के मुद्दे दब रहे हैं, बल्कि विधायी कार्यों की प्रभावशीलता भी प्रभावित हो रही है।
संसद का मुख्य कार्य एजेंडे की जांच, बहस और चुनौती देना है। हालांकि, यह प्रक्रिया व्यवधान और अनादर के साथ नहीं, बल्कि गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं के तहत होनी चाहिए। वॉकआउट जैसे शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अतीत में प्रभावी रहे हैं क्योंकि उन्होंने अन्य सदस्यों के अधिकारों का हनन नहीं किया। लेकिन वर्तमान में राजनीतिक एजेंडों से प्रेरित व्यवधानों ने सदन को अक्सर ठप कर दिया है।
ऐसे कई मौके भी आए हैं जब संसद ने अपनी सर्वोच्चता साबित की है। 1991 के आर्थिक सुधार और 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण जैसे उदाहरण इस बात का प्रमाण हैं कि राष्ट्रीय हित के मामलों में संसद पक्षपात को दरकिनार कर सकती है। इन घटनाओं ने दिखाया कि एकजुट संसद कितने बड़े बदलाव ला सकती है।




