कैसे हुआ खुलासा?
यह मामला तब सामने आया जब सामाजिक कार्यकर्ता संजय गुप्ता को इस डॉक्टर की पहचान पर संदेह हुआ। उन्हें यह सूचना मिली कि बीके अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर पंकज मोहन असल में फर्जी हैं और उन्होंने किसी असली डॉक्टर के नाम और दस्तावेजों का उपयोग कर नौकरी प्राप्त की है। संजय गुप्ता ने खुद अपने स्तर पर इसकी जांच शुरू की और कई प्रमाण जुटाए। जब उन्हें पर्याप्त सबूत मिले, तो उन्होंने 3 नंबर पुलिस चौकी के साथ-साथ फरीदाबाद के सिविल सर्जन को शिकायत दी। लेकिन इस शिकायत पर तुरंत कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
पुलिस तक मामला पहुंचा
बाद में संजय गुप्ता ने डीसीपी एनआईटी, मकसूद अहमद से मुलाकात की और उन्हें सभी दस्तावेज सौंपे। डीसीपी ने तत्काल मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए। उन्होंने कहा, “शिकायत मिलने के बाद पुलिस गहराई से दस्तावेजों की जांच कर रही है और जो भी साक्ष्य सामने आएंगे, उसी के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।”
डॉक्टर की नियुक्ति और हटाने की कहानी
जानकारी के अनुसार, बीके अस्पताल के हार्ट सेंटर की शुरुआत 2018 में हरियाणा सरकार और Meditrina Hospitals Pvt. Ltd. के बीच हुए एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) अनुबंध के तहत हुई थी। जुलाई 2023 में इस सेंटर में डॉक्टर पंकज मोहन की नियुक्ति की गई थी। हालांकि, फरवरी 2025 में जब उन पर फर्जीवाड़े का संदेह गहराया, तो उन्हें पद से हटा दिया गया।
मजेदार बात यह है कि अस्पताल प्रशासन ने उनकी नियुक्ति से पहले जरूरी वैरिफिकेशन की प्रक्रिया को ही दरकिनार कर दिया। जबकि अनुबंध में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान था कि सभी नियुक्त डॉक्टरों की जांच सिविल सर्जन और पीएमओ कार्यालय द्वारा की जाएगी।
अस्पताल प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर उठें सवाल
इतना ही नहीं, आरोप है कि फर्जी डॉक्टर ने आयुष्मान भारत योजना, बीपीएल और आरक्षित श्रेणी के मरीजों के नाम पर फर्जी बिल भी लगाए। इससे सरकार को आर्थिक नुकसान हुआ और जरूरतमंद मरीजों को झूठी चिकित्सा सेवा के नाम पर ठगा गया। इस पूरे मामले में बीके अस्पताल के प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीएमओ सत्येंद्र वशिष्ठ ने बताया कि उन्हें पुलिस चौकी से डॉक्टर के कागजात मांगे गए थे और वे कागज पुलिस को सौंप दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस इस समय मामले की जांच कर रही है।