




उनका कहना है कि यह प्रणाली न सिर्फ उनकी निजता में हस्तक्षेप करती है, बल्कि उनके कार्य-परिस्थितियों और कार्यशैली पर भी प्रतिकूल असर डाल रही है। यही कारण है कि अब स्वास्थ्यकर्मी चार अगस्त को प्रतीकात्मक रूप से दो घंटे का वर्क सस्पेंड करने जा रहे हैं। अगर सरकार ने उनकी मांगों पर गौर नहीं किया, तो आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह ठप करने जैसे कठोर कदम उठाए जा सकते हैं।
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कर्मचारियों और डॉक्टरों ने सरकार को ज्ञापन सौंपकर जियो फेंसिंग आधारित उपस्थिति प्रणाली को तत्काल हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि इस तकनीक के जरिए लोकेशन ट्रैकिंग करना न केवल उनकी स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि इससे कार्य के दौरान मानसिक दबाव भी बढ़ता है।
कर्मचारी एकता यूनियन के प्रधान हरिराज ने जानकारी दी कि सरकार ने हाल ही में प्रदेश के सभी सिविल अस्पतालों में यह प्रणाली लागू की है, जिसमें कर्मचारियों की हाज़िरी मोबाइल लोकेशन के माध्यम से ट्रैक की जा रही है। यह तरीका न सिर्फ अव्यवहारिक है, बल्कि इससे कर्मचारियों की गरिमा को ठेस भी पहुंच रही है।
कोरोना महामारी के दौर में जिस डॉक्टर समुदाय को समाज और सरकार ने ‘कोरोना योद्धा’ का दर्जा दिया था, आज उसी वर्ग को तकनीकी निगरानी के ज़रिए कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। डॉक्टरों ने सवाल उठाया कि जिन पर संकट के समय फूल बरसाए गए, अब उन्हीं पर अविश्वास क्यों?
आज प्रदेश के कई जिलों में स्थित सिविल अस्पतालों में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने सरकार को स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो 4 अगस्त को प्रारंभिक रूप में दो घंटे की स्वास्थ्य सेवा बाधित की जाएगी। इसके बाद भी अगर समाधान नहीं निकला, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।
इस चेतावनी के बाद स्वास्थ्य महकमे में हलचल बढ़ गई है। अगर यह विरोध लंबे समय तक चला, तो सामान्य मरीजों की चिकित्सा, इमरजेंसी सेवाएं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर सीधा असर पड़ सकता है। फिलहाल डॉक्टरों और कर्मचारियों ने केवल प्रतीकात्मक रूप से दो घंटे का वर्क सस्पेंड घोषित किया है, लेकिन यह केवल ‘चेतावनी’ भर है।




