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Kanwar Yatra 2025: सावन में शिवभक्ति की दिखी अनोखी मिसाल, संतान की मन्नत पूरी होने पर पूरा परिवार निकला कांवड़ यात्रा पर

BY: • LAST UPDATED : July 21, 2025
Inkhabar Haryana, Kanwar Yatra 2025: सावन का महीना शिवभक्तों के लिए सिर्फ एक धार्मिक समय नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और संकल्पों का प्रतीक होता है। हरिद्वार से गंगाजल लाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक करने की परंपरा को निभाने के लिए लाखों श्रद्धालु हर वर्ष कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। इन्हीं श्रद्धालुओं के बीच इस बार एक ऐसा परिवार शामिल हुआ है, जिसने अपनी आस्था और शिवभक्ति की मिसाल कायम कर दी है पलवल निवासी रजनी और सन्नी अपने छोटे बेटे के साथ पहली बार कांवड़ यात्रा पर निकले हैं, लेकिन इस यात्रा के पीछे की कहानी हर किसी को भावुक कर रही है।

14 साल की प्रतीक्षा और शिव से एक मन्नत

रजनी और सन्नी पिछले 14 वर्षों से संतान प्राप्ति की कामना कर रहे थे। उन्होंने डॉक्टरों से इलाज करवाया, मंदिरों में दर्शन किए और तमाम उपाय अपनाए, लेकिन जब सब प्रयास निष्फल हो गए, तो उन्होंने अपने जीवन की सारी उम्मीदें भोलेनाथ पर छोड़ दीं। उन्होंने न केवल सच्चे मन से शिव की अराधना की, बल्कि एक गहरी मन्नत भी मांगी अगर उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है, तो वह पूरा परिवार मिलकर हरिद्वार से गंगाजल लाएगा और शिव मंदिर में जलाभिषेक करेगा।

भोलेनाथ की कृपा और एक नई शुरुआत

कुछ ही समय बाद रजनी और सन्नी की जिंदगी में एक चमत्कार घटित हुआ उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया। इस संतान को वे केवल एक संयोग नहीं, बल्कि शिव की कृपा मानते हैं। इस अनुभव ने उनकी आस्था को और प्रगाढ़ कर दिया। उनके लिए अब शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन का आधार बन गए।

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अब बेटे के साथ निकले हैं आस्था की यात्रा पर

आज जब उनका बेटा डेढ़ साल का हो चुका है, तो पूरा परिवार अपने उस संकल्प को निभाने के लिए सावन की कांवड़ यात्रा पर निकला है। हरिद्वार के हर की पौड़ी से गंगाजल लेकर वे फरीदाबाद होते हुए पलवल के शिव मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए पैदल चल रहे हैं। नारंगी वस्त्र, सिर पर कांवड़, हाथों में श्रद्धा और होठों पर “बोल बम” के जयकारे यह दृश्य श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
परिवार का कहना है कि यह यात्रा उनके लिए कोई औपचारिक परंपरा नहीं है, बल्कि भगवान शिव के प्रति उनके आभार की सच्ची अभिव्यक्ति है। रजनी कहती हैं कि जब जीवन में हर रास्ता बंद हो गया था, तब सिर्फ एक दरवाजा खुला और वो था भोलेनाथ का। उन्होंने हमें वो खुशी दी, जो हमसे 14 सालों तक दूर थी।