




कृपाल राम ने बताया कि उनका ढाबा 24 घंटे चलता था। दिन और रात की शिफ्टों में वर्कर काम करते थे। हर दिन सैकड़ों ग्राहकों की आवाजाही रहती थी। लेकिन फरवरी के बाद से यह सब खत्म हो गया। किसानों के धरने के कारण बॉर्डर बंद हो गया और उनका व्यवसाय पूरी तरह ठप पड़ गया।
उन्होंने कहा कि जब से किसान आंदोलन शुरू हुआ है, तब से हमारा काम ठप है। जो सामान ढाबे में बचा था, उसे कबाड़ में बेचने की नौबत आ गई है। परिवार की हालत इतनी खराब हो गई है कि हम सड़क पर आने को मजबूर हैं।
काम बंद होने के बाद कृपाल राम ने मजदूरी का सहारा लिया, लेकिन वहां भी हालात मुश्किल बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि जहां मजदूरी करता हूं, वहां समय पर पैसे तक नहीं मिलते। कभी 300 रुपए की मजदूरी मिलती है, तो कभी वह भी नहीं।
कृपाल राम का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए। हमने पांच साल की मेहनत से इस ढाबे को खड़ा किया था। यह सिर्फ मेरी नहीं, खनौरी के कई परिवारों की कहानी है। किसान आंदोलन के कारण बहुत से लोग सड़क पर आ गए हैं। सरकार को हमें बचाने के लिए कदम उठाने चाहिए।




