Inkhabar Haryana, Sonipat News: हरियाणा के सोनीपत के गांव तिहाड़ मलिक में पंचायती जमीन पर अवैध कब्जे को लेकर ग्रामीणों में भारी रोष देखने को मिल रहा है। यह विवाद तब गहराया जब आंबेडकर भवन की चहारदीवारी निर्माण के लिए स्वीकृत सरकारी ग्रांट के बावजूद अब तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कुछ लोगों द्वारा जमीन पर कब्जा जमाए रखा गया है, जिससे निर्माण कार्य में देरी हो रही है।
पैमाइश के बाद भी नहीं हट पाया कब्जा
ग्रामवासियों ने बताया कि आंबेडकर भवन के लिए चिन्हित भूमि की विधिवत पैमाइश 2 मई 2025 को कराई गई थी। इस प्रक्रिया में सरपंच, गिरदावर, नंबरदार, चौकीदार और अन्य ग्राम स्तरीय अधिकारी भी मौजूद रहे। प्रशासनिक उपस्थिति में हुई इस पैमाइश की रिपोर्ट भी अब सामने आ चुकी है, जिसमें स्पष्ट रूप से संबंधित जमीन पंचायती घोषित की गई है।
लेकिन, इसके बावजूद कुछ स्थानीय लोगों ने उक्त भूमि पर कब्जा जमाए रखा है। ग्रामीणों का कहना है कि इन लोगों ने जमीन पर कुरड़ी डाल रखी है और किसी भी चेतावनी या निर्देश को गंभीरता से नहीं लिया गया।
प्रशासनिक चेतावनियों की अनदेखी
ग्रामीणों ने जानकारी दी कि सरपंच और प्रशासन की ओर से कई बार मुनादी करवाई गई। इसके अतिरिक्त मौखिक रूप से भी कब्जाधारियों को कई बार समझाया गया कि वे जमीन खाली करें, ताकि गांव में प्रस्तावित आंबेडकर भवन का निर्माण कार्य आरंभ हो सके। परंतु इन सभी प्रयासों को नजरअंदाज करते हुए संबंधित लोगों ने भूमि खाली नहीं की।
लघु सचिवालय में जताया विरोध
गुरुवार को नाराज ग्रामीणों का एक प्रतिनिधिमंडल सोनीपत स्थित लघु सचिवालय पहुंचा और प्रशासनिक अधिकारियों को मामले से अवगत कराया। ग्रामीणों ने इस बात पर जोर दिया कि गांव में अनुसूचित जाति समाज के लिए आंबेडकर भवन का निर्माण अत्यंत जरूरी है, लेकिन कुछ स्वार्थी तत्वों के कारण यह विकास कार्य रुका पड़ा है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की जाए और पंचायती जमीन को कब्जे से मुक्त करवाया जाए, ताकि स्वीकृत ग्रांट का उपयोग समय रहते किया जा सके और गांव को एक महत्वपूर्ण सामुदायिक भवन मिल सके।
ग्रामीणों की चेतावनी
यदि प्रशासन ने शीघ्र कार्रवाई नहीं की, तो ग्रामीणों ने आगामी समय में बड़े स्तर पर धरना-प्रदर्शन की चेतावनी भी दी है। उनका कहना है कि यह केवल भूमि पर कब्जे का मामला नहीं है, बल्कि गांव के सामाजिक और सामुदायिक विकास को अवरुद्ध करने का प्रयास है, जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।